बलदेव धाम में वर्षभर अनेक धार्मिक उत्सव भव्यता से मनाए जाते हैं। यहाँ मनाई जाने वाली कपड़ा फाड़ होली अर्थात् दाऊजी का हुरंगा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। नीचे मंदिर के प्रमुख पर्वों की जानकारी दी गई है।
भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को भगवान बलराम जी का प्राकट्य उत्सव अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है। इस अवसर पर विशाल प्रांतीय मेले का आयोजन होता है तथा भगवान को भव्य छप्पन भोग अर्पित किया जाता है।
चैत्र कृष्ण द्वितीया को मनाया जाने वाला यह हुरंगा ब्रजमंडल के होली उत्सवों का मुकुटमणि माना जाता है। मंदिर परिसर में बड़े हौज रंगीन जल से भर दिए जाते हैं, और हुरियारे-हुरियारिनें झांझ, ढप, मंजीरे की गूँज में परंपरागत रीति से होली खेलते हैं।
ब्रजभूमि की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति, लोकपरंपरा, संगीत और आनंद का अद्भुत उत्सव है। मथुरा-वृंदावन के साथ-साथ बलदेव स्थित श्री दाऊजी महाराज मंदिर की होली अपनी अनोखी परंपराओं के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां बसंत पंचमी से ही होली के उत्सवों का आरंभ हो जाता है और डोलोत्सव तक मंदिर में रागरंग, समाज गायन, रंग-गुलाल और विभिन्न धार्मिक परंपराओं का आयोजन चलता रहता है।
दाऊजी महाराज का हुरंगा इस पूरे उत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण माना जाता है। दाऊजी मंदिर का यह प्रसिद्ध हुरंगा देवर-भाभी की पारंपरिक होली, टेसू के रंग, गुलाल, ढप, नगाड़े, शहनाई और लोकगीतों से जीवंत हो उठता है। इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक बलदेव पहुंचते हैं।
ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ जब पूरी प्रकृति आनंदित हो उठती है, तब ब्रजभूमि में भी होली के उत्सव का रंग गहराने लगता है। श्री दाऊजी महाराज मंदिर, बलदेव में माघ शुक्ल पंचमी यानी बसंत पंचमी से ही होली उत्सव का शुभारंभ माना जाता है। यह उत्सव चैत्र कृष्ण पंचमी के डोलोत्सव तक चलता है। मंदिर में पारंपरिक लोक गायकी और समाज गायन की स्वर-लहरियां गूंजने लगती हैं। भक्तजन “खेलत बसंत बलभद्र देव, लीला अनंत कोई लहै न भेद” जैसे पारंपरिक पदों का गायन झांझ, ढप, मृदंग और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्रों के साथ करते हैं। फाल्गुन मास आते ही होली के अनेक पारंपरिक पदों और फाग गायन का क्रम और भी आनंदमय हो जाता है।
दाऊजी महाराज की होली में समाज गायन का विशेष महत्व है। मंदिर परिसर में एकत्रित होकर सेवायत, भक्त और समाज के लोग पारंपरिक होली गीतों का सामूहिक गायन करते हैं। इस लोकपरंपरा की विशेषता यह है कि बिना आधुनिक ध्वनि-विस्तारक यंत्रों के भी सामूहिक गायन की आवाज दूर तक सुनाई देती है। श्रृंगार आरती और रात्रि की संध्या आरती के समय भी मंदिर में विशेष धार्मिक वातावरण दिखाई देता है। रंग और गुलाल से सराबोर श्रद्धालु इस दिव्य वातावरण का आनंद लेते हुए स्वयं को धन्य मानते हैं। होलाष्टक से लेकर डोल पंचमी तक चलने वाली रंगों की यह परंपरा ब्रज की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
होली की पूर्णिमा से दाऊजी मंदिर में विशेष उत्सवों का क्रम और अधिक भव्य हो जाता है। मंदिर परिसर में रंग, गुलाल, अबीर, चोबा और चंदन की बौछारें वातावरण को रंगमय बना देती हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और पारंपरिक होली उत्सव में सहभागी बनते हैं। शाम के समय श्री ठाकुर जी के प्रतीक आयुध हल और मूसल के साथ होली पूजन की परंपरा होती है। इस धार्मिक यात्रा में महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। परिक्रमा मार्ग से होली पूजन स्थल तक का पूरा क्षेत्र गुलाल से रंग उठता है और वातावरण में ब्रज की होली के पारंपरिक गीत गूंजते रहते हैं।
होली के अगले दिन प्रतिपदा को मंदिर परिसर में रंग और गुलाल का उत्सव जारी रहता है। इस दिन देवर-भाभी की पारंपरिक होली विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। सेवायत परिवारों की बहुएं अपने देवरों के साथ पारंपरिक परिधानों में उत्सव और नृत्य में भाग लेती हैं। शहनाई और नगाड़ों की ध्वनि के बीच होने वाला यह पारंपरिक आयोजन दाऊजी महाराज की होली को अन्य स्थानों से अलग पहचान देता है। यहां होली केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लोकसंगीत, नृत्य और पारंपरिक ब्रज संस्कृति का जीवंत रूप दिखाई देता है।
होली उत्सव के द्वितीया दिवस पर श्री दाऊजी महाराज मंदिर का प्रसिद्ध हुरंगा आयोजित होता है। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में रंगों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बड़ी-बड़ी हौजों में टेसू, केसर और हल्दी से तैयार पारंपरिक रंगों की छटा दिखाई देती है। मंदिर परिसर और आसपास की छतों पर श्रद्धालुओं एवं दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती है। हुरंगा देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक भी बलदेव पहुंचते हैं। दोपहर के समय राजभोग के बाद दोनों भाइयों के प्रतीक स्वरूप दो झंडे श्री ठाकुर जी की आज्ञा से मंदिर के मध्य में उपस्थित किए जाते हैं। इसके बाद सेवायत गोस्वामी परिवार की बधुएं और ग्वाल-बाल स्वरूप पंडागण मंदिर में एकत्रित होते हैं।
दाऊजी महाराज के हुरंगा की सबसे चर्चित परंपराओं में देवर-भाभी के बीच खेली जाने वाली पारंपरिक होली शामिल है। हुरियारे पुरुष हौजों और कुण्डों में भरे रंगों से होली खेलते हैं, जबकि हुरियारिनें पारंपरिक रूप से उनके वस्त्र पकड़कर खींचती हैं और डंडों से प्रहार करती हैं। इसी कारण इस आयोजन को कई लोग कपड़ा फाड़ होली के नाम से भी जानते हैं। यह पूरा आयोजन अपनी पारंपरिक मर्यादाओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार होता है। चारों ओर उड़ता गुलाल, टेसू के रंग, नगाड़ों और शहनाई की धुन तथा ब्रज के पारंपरिक होली गीत वातावरण को अत्यंत उत्सवमय बना देते हैं। दाऊजी महाराज के हुरंगा के दौरान ब्रज की पारंपरिक फाग और होली गायकी वातावरण को विशेष रंग प्रदान करती है। “आज विरज में होरी रे रसिया...” जैसे पारंपरिक पदों के साथ अन्य लोकगीतों की स्वर-लहरियां श्रद्धालुओं और दर्शकों को ब्रज की लोकसंस्कृति से जोड़ती हैं।
आकाश में उड़ते विभिन्न रंगों और गुलाल का मिश्रण हुरंगा की विशेष पहचान बन जाता है। रंगों के इस अनोखे संयोजन को देखने के लिए कला और लोकसंस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी यहां पहुंचते हैं। पारंपरिक रूप से हुरंगा का यह रंगोत्सव दोपहर के समय तक चलता है। हुरंगा उत्सव के दौरान श्री रेवती जी और श्री राधा जी से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं और संकेतों का भी विशेष महत्व माना जाता है। उत्सव के बाद सभी प्रतिभागी परिक्रमा के लिए आगे बढ़ते हैं और पूरे मार्ग में ब्रज के पारंपरिक होली गीत गूंजते रहते हैं। इस प्रकार हुरंगा धीरे-धीरे अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ता है।
दाऊजी महाराज के हुरंगा में बड़ी मात्रा में गुलाल और रंग का प्रयोग होता है। परंपरागत विवरणों में लगभग 20 मन गुलाल उड़ने का उल्लेख मिलता है। रंगों से भरा यह विशाल उत्सव दाऊजी मंदिर की होली को ब्रज के प्रमुख होली आयोजनों में विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
होली उत्सव के अंतिम चरण में पंचमी के दिन मंदिर में समाज रंग और गुलाल का विशेष आयोजन होता है। इस अवसर पर पारंपरिक समाज गायन में होली के भावपूर्ण पद गाए जाते हैं। “जो जीवै सो खेलै फाग, हरि संग झूमरि खेलियै...” जैसे पद वातावरण में भक्ति और प्रेम का भाव उत्पन्न करते हैं। इस दिन के साथ दाऊजी महाराज की होली के रंगोत्सव को अगले वर्ष के लिए विदाई दी जाती है। हालांकि रंगों का यह उत्सव समाप्त हो जाता है, लेकिन दाऊजी महाराज की होली, हुरंगा और ब्रज की लोकपरंपरा से जुड़ी स्मृतियां श्रद्धालुओं के मन में लंबे समय तक बनी रहती हैं।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को श्री दाऊजी महाराज का पावन प्राकट्य उत्सव बलदेव छठ (देवछठ) के रूप में अत्यंत श्रद्धा, भव्यता और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर मंदिर में नौ दिवसीय बलदेव छठ महा-महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। नौ दिनों तक मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें सुप्रसिद्ध संतों एवं भागवताचार्यों द्वारा श्रीमद्भागवत कथा, भजन-कीर्तन, धार्मिक प्रवचन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान प्रमुख हैं। इन आयोजनों से संपूर्ण मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहता है और दूर-दूर से श्रद्धालु इस महा-महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए पहुँचते हैं।
नौ दिवसीय महोत्सव के अंतिम एवं मुख्य दिवस, अर्थात् बलदेव छठ के दिन श्री दाऊजी महाराज के मंदिर में प्रातःकाल से ही विशेष धार्मिक एवं पारंपरिक आयोजनों का क्रम प्रारंभ हो जाता है। बलदेव छठ के पावन दिन मंदिर के कपाट प्रातः 4 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। इसके पश्चात श्री दाऊजी महाराज का नित्य क्रम के अनुसार पवित्र स्नान एवं विशेष श्रृंगार किया जाता है। प्रातःकाल से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के मंगला दर्शन के लिए मंदिर में उपस्थित होते हैं।
प्रातःकाल 51 वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा श्री बलभद्र सहस्रनाम का सामूहिक पाठ किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार और भगवान श्री बलभद्र के सहस्र नामों के पवित्र उच्चारण से मंदिर परिसर का वातावरण अत्यंत आध्यात्मिक हो उठता है। इसके पश्चात विधि-विधानपूर्वक बलभद्र यज्ञ का आयोजन किया जाता है। दोपहर लगभग 12 बजे श्री दाऊजी महाराज का वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंचामृत से विशेष अभिषेक कराया जाता है। अभिषेक के पश्चात भगवान का दिव्य जवाहरात श्रृंगार किया जाता है। इस अवसर पर श्री दाऊजी महाराज को मुकुट, कुण्डल, हार, कंठहार, बाजूबंद, कंगन, करधनी, अंगूठियाँ तथा अन्य रत्नजड़ित दिव्य आभूषण धारण कराए जाते हैं। इस मनोहारी श्रृंगार के पश्चात भक्तों को भगवान के विशेष दर्शन प्राप्त होते हैं।
दोपहर लगभग 1 बजे श्री दाऊजी महाराज के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में दधिकांधा एवं नंदोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर दही और हल्दी से तैयार छीछी को भक्तों पर उछाला जाता है, जिससे वातावरण आनंद और उल्लास से भर उठता है। दधिकांधा उत्सव में गोस्वामी समाज द्वारा विशेष पारंपरिक आयोजन किया जाता है, जिसमें नारियल लुटाया जाता है। नारियल प्राप्त करने के लिए गोस्वामी जन आपस में पूरे उत्साह के साथ जोर-आजमाइश करते हैं। यह आयोजन मल्लयुद्ध की परंपरा का स्मरण कराता है। जो गोस्वामी नारियल प्राप्त कर लेता है, उसे विजेता माना जाता है। श्री दाऊजी महाराज का मल्लविद्या से विशेष संबंध माना जाता है, इसलिए यह परंपरा उनके प्राकट्य उत्सव को और भी विशिष्ट बनाती है। बलदेव छठ के पावन अवसर पर संध्या समय श्री दाऊजी महाराज को 11 कुंतल शुद्ध देशी घी से निर्मित बेसन के लड्डुओं का विशाल भोग अर्पित किया जाता है। भोग के पश्चात प्रसाद गोस्वामी समाज में वितरित किया जाता है।
संध्या समय श्री दाऊजी महाराज की भव्य नगर परिक्रमा निकाली जाती है। इस दौरान श्री दाऊजी महाराज के चित्र-विग्रह को प्रतीकात्मक रूप से गोस्वामी जन अपने कंधों पर धारण कर नगर में परिक्रमा करते हैं। इस पावन शोभायात्रा में गोस्वामी समाज के पुरुष पारंपरिक धोती-बागलबंदी एवं धोती-कुर्ता धारण कर सम्मिलित होते हैं। वहीं गोस्वामी समाज की महिलाएँ श्री दाऊजी महाराज के श्रृंगार की प्रसादी से निर्मित पारंपरिक लहंगा-फरिया धारण कर शोभायात्रा में शामिल होती हैं। पारंपरिक वेशभूषा, भक्ति और उल्लास से सुसज्जित यह नगर परिक्रमा अत्यंत मनोहारी एवं दर्शनीय होती है।
इस प्रकार नौ दिवसीय बलदेव छठ महा-महोत्सव का मुख्य दिवस श्री दाऊजी महाराज के विशेष अभिषेक, दिव्य श्रृंगार, श्री बलभद्र सहस्रनाम पाठ, बलभद्र यज्ञ, दधिकांधा-नंदोत्सव, विशाल छप्पन भोग एवं लड्डू भोग तथा भव्य नगर परिक्रमा जैसे धार्मिक एवं पारंपरिक आयोजनों से परिपूर्ण होता है। यह महोत्सव ब्रज की समृद्ध धार्मिक परंपरा, भक्ति, लोकाचार और श्री दाऊजी महाराज की दिव्य महिमा का अद्भुत उत्सव है।
चैत्र, शरद, मार्गशीर्ष पूर्णिमा एवं बलदेव छठ, दाऊजी हुरंगा के अवसर पर विशेष रूप से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख पर्वों का क्रम, ऋतुक्रम के अनुसार।
दाऊजी महाराज की सेवा में गुलाल अर्पित कर होली के पदों का गायन आरंभ होता है।
ब्रजमंडल का सबसे प्रसिद्ध होली उत्सव — रंगीन जल, ढप-मंजीरे और परंपरागत उल्लास।
डोल पंचमी उत्सव – ब्रज की 45 दिवसीय होली का समापन।
राम नवमी के पावन एवं मंगलमय पर्व पर श्री दाऊजी महाराज का भव्य, दिव्य और मनोहारी श्रृंगार किया जाता है। भगवान की विशेष पूजा-अर्चना के उपरांत 11 कुंतल बेसन से शुद्ध घी में निर्मित लड्डुओं का विशाल भोग श्रद्धा एवं प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाता है।
श्री दाऊजी महाराज एवं माता रेवती जी के दिव्य विग्रह के प्राकट्यकर्ता परम पूज्य गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी का पावन जन्म दिवस मंदिर में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
वर्षा ऋतु में भगवान का झूला श्रृंगार तथा गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का पावन उत्सव भव्य श्रृंगार एवं भोग के साथ मनाया जाता है।
भगवान बलराम जी का पावन प्राकट्य उत्सव विशाल मेले एवं भव्य छप्पन भोग के साथ बड़े ही धूमधाम, श्रद्धा और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर नौ दिवसीय महा-महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भगवान बलराम जी की आराधना और महिमा का गुणगान किया जाता है।
शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात्रि में विशेष दर्शन एवं मेले का आयोजन।
मंदिर को दीपों से सजाकर भव्य श्रृंगार एवं विशेष आरती की जाती है।
संवत् 1638 में इसी पावन तिथि पर श्री दाऊजी महाराज का दिव्य विग्रह वटवृक्ष के नीचे से पुनः प्रकट हुआ था। इसी उपलक्ष्य में खीर का भोग अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है तथा एक माह तक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु सम्मिलित होकर भगवान के दिव्य दर्शन करते हैं।
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