इतिहास

श्री दाऊजी मंदिर का संपूर्ण इतिहास

श्री दाऊजी मंदिर का संपूर्ण इतिहास

॥ मंदिर सिंहावलोकन एवं अलौकिक महिमा ॥

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में पवित्र ब्रजभूमि के हृदय में स्थित श्री दाऊजी महाराज मंदिर, बलदेव, प्राचीन वैष्णव भक्ति और ब्रज संस्कृति का एक परम तेजस्वी केंद्र है। मथुरा से लगभग 20 किलोमीटर दूर, मथुरा-एटा मार्ग पर स्थित यह पावन नगरी प्राचीन ग्रंथों में "विद्रुमवन" के नाम से जानी जाती है। गोकुल एवं महावन, जो पुराणों में वर्णित वृहदवन के नाम से विख्यात हैं, इसी मार्ग पर पड़ते हैं।

भाद्रपद शुक्ल षष्ठी, जिसे बलदेव छठ कहा जाता है, भगवान बलराम जी के प्राकट्य उत्सव के रूप में विशेष श्रद्धा से मनाई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान बलराम जी का जन्म माता रोहिणी के गर्भ से, श्री नंदजी के संरक्षण में हुआ और वे श्रीकृष्ण से लगभग 11 माह और कुछ दिन बड़े माने जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम जी, जिन्हें ब्रज में प्रेमपूर्वक दाऊजी महाराज, दाऊ बाबा और बलदाऊ जी कहा जाता है, इस धाम के आराध्य देव हैं। धार्मिक परंपरा में भगवान बलराम जी को साक्षात शेषनाग का अवतार माना जाता है। यहाँ उन्हें केवल एक देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रज के राजा एवं संरक्षक — के रूप में पूजा जाता है। यही कारण है कि भगवान यहाँ राजसी स्वरूप में ऊँचे सिंहासन पर विराजमान हैं, और उनकी सेवा में राजदरबार जैसी भव्यता झलकती है।

भगवान के हाथों में उनके प्रमुख आयुध हल और मूसल सुशोभित हैं, जो शक्ति, धर्मरक्षा तथा कृषि संस्कृति के प्रतीक हैं। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान दाऊजी महाराज की अत्यंत विशाल, भव्य और श्याम वर्ण की अखंड पाषाण प्रतिमा अपनी दिव्य अर्धांगिनी रेवती जी के साथ विराजमान है। भक्तों की धार्मिक आस्था के अनुसार भगवान के दर्शन मनुष्य को आंतरिक बल, साहस और निर्भयता प्रदान करते हैं।

आज भी गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी के वंशज ही श्री दाऊजी महाराज मंदिर की सेवा-पूजा, धार्मिक परंपराओं एवं आंतरिक व्यवस्थाओं के प्रमुख सेवायत हैं। मंदिर की सेवा-व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और दायित्वों की बागडोर इसी वंश के हाथों में है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही वंश इस प्राचीन सेवा-परंपरा का निर्वहन करता आ रहा है।

॥ विद्रुम वन – श्री बलराम जी का जन्मस्थान ॥

भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलराम जी का जन्म रहस्यमयी और दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, जब देवकी जी के गर्भ में सातवाँ बालक आया, तब योगमाया ने उस बालक को देवकी जी के गर्भ से निकालकर वसुदेव जी की ज्येष्ठ पत्नी माता रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। इसी कारण भगवान बलराम जी को संकर्षण भी कहा जाता है। उस समय माता रोहिणी कंस के अत्याचार और भय के कारण गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के संरक्षण में रह रही थीं। भगवान बलराम जी के जन्म का समय निकट आने पर माता रोहिणी को गोकुल के समीप स्थित एक पवित्र स्थान विद्रुम वन में ले जाया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली, शांति और पवित्र वातावरण से युक्त था तथा नंद बाबा की गायें भी इसी क्षेत्र में विचरण करती थीं। विद्रुम वन के समीप अवैरनी नामक एक स्थान का भी उल्लेख मिलता है। परंपरा में इस स्थान को वैर और द्वेष से रहित, शांत तथा सुरक्षित क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। कंस के अत्याचारों से दूर होने के कारण यह स्थान माता रोहिणी के लिए सुरक्षित माना गया।

भगवान बलराम जी के जन्म के संबंध में परंपरागत रूप से निम्न श्लोक का उल्लेख किया जाता है—

शुभे भाद्रपदे मासे, ह्यागते पुण्ययोगतः।
षष्ठ्याम् तिथौ शुक्लपक्षे मध्याह्ने वृष्चि लग्नके।
रोहिण्याम् च स्वयं जातो आदिशेषो महाबलः॥

परंपरागत धार्मिक ग्रंथों और गर्ग संहिता के अनुसार, इसी पावन प्रसंग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को दोपहर के समय माता रोहिणी के गर्भ से भगवान बलराम जी का प्राकट्य हुआ। भगवान बलराम जी को भगवान विष्णु के अनंत शेष का अवतार माना जाता है और वे अपनी अद्भुत शक्ति के कारण बलभद्र, बलदेव, हलधर और संकर्षण जैसे नामों से भी प्रसिद्ध हैं।

॥ श्री दाऊजी महाराज मंदिर की भव्यता ॥

दाऊजी महाराज का मंदिर एक विशालकाय देवालय है, जो मजबूत प्राचीरों से घिरा होने के कारण एक दुर्ग के समान दिखाई देता है। मंदिर के चारों ओर सर्प की कुंडली के समान परिक्रमा मार्ग के साथ एक पूर्ण विकसित बाजार स्थित है। मंदिर के पीछे एक विशाल कुंड स्थित है, जिसे बलभद्र कुंड के नाम से जाना है। धार्मिक परंपरा में इसे क्षीरसागर भी कहा जाता है। मंदिर के चार प्रमुख द्वार बताए जाते हैं—

  • सिंहचौर
  • जनानी ड्योढ़ी
  • गोशालाद्वार
  • बड़वाले दरवाजे

॥ 5,000 वर्ष प्राचीन दिव्य विग्रह ॥

धार्मिक परंपरा में गर्भगृह में स्थापित श्री दाऊजी महाराज और माता रेवती जी के विग्रहों को लगभग पाँच हजार वर्ष प्राचीन माना जाता है। मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण के प्रपौत्र राजा वज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्यस्मृति और उनकी उपासना परंपरा को स्थापित करने के लिए चार देवविग्रह तथा चार देवियों के विग्रह स्थापित किए थे। वर्तमान श्रीबलदेव विग्रह उन्हीं प्राचीन विग्रहों में से एक माना जाता है। पुरातत्व संबंधी मतों में इस विग्रह को कुषाणकाल से भी पूर्व का माना जाने का उल्लेख मिलता है और इसे प्राचीन ब्रज देवस्थानों के अत्यंत महत्वपूर्ण विग्रहों में गिना जाता है।

॥ गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी को दिव्य आदेश ॥

श्री दाऊजी महाराज के प्राकट्य से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में विद्रुमवन में वटवृक्ष के नीचे घटी एक अत्यंत मार्मिक और भक्तिभाव से परिपूर्ण कथा का विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यता के अनुसार मध्यकाल में जब ब्रजभूमि पर विदेशी आक्रमणों का संकट बढ़ने लगा, तब श्री दाऊजी महाराज के दिव्य विग्रह को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें विद्रुमवन क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे भूमि में सुरक्षित कर दिया गया था। समय बीतता गया और श्री दाऊजी महाराज का दिव्य विग्रह लंबे समय तक उसी स्थान पर भूमिस्थ रहा। उस स्थान के आसपास रहने वाले लोगों को यह ज्ञात नहीं था कि धरती के भीतर स्वयं ब्रजराज श्री दाऊजी महाराज विराजमान हैं। बाहर से देखने पर वह स्थान एक सामान्य वटवृक्ष के नीचे की भूमि जैसा ही दिखाई देता था।

इसी दौरान उस क्षेत्र में एक गाय प्रतिदिन चरने के लिए आया करती थी। स्थानीय धार्मिक कथा के अनुसार जब भी वह गाय उस प्राचीन वटवृक्ष के पास पहुँचती, तो वह एक निश्चित स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती। वहाँ पहुँचते ही उसके शरीर से एक अद्भुत परिवर्तन दिखाई देता था और वह अपने थनों से स्वतः दूध की धारा बहाने लगती थी। गाय प्रतिदिन अपना दूध उस स्थान पर गिराकर आगे चली जाती। यह घटना कई दिनों तक नियमित रूप से होती रही। गाय के स्वामी ने जब देखा कि गाय घर लौटने पर पर्याप्त दूध नहीं देती, तो उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने गाय पर ध्यान देना शुरू किया और एक दिन उसके पीछे-पीछे उस स्थान तक पहुँचे। उन्होंने देखा कि गाय वटवृक्ष के नीचे एक निश्चित स्थान पर जाकर स्वयं खड़ी हो गई और बिना किसी व्यक्ति के दुहने के उसके थनों से दूध की धारा भूमि पर गिरने लगी। यह दृश्य देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें समझ नहीं आया कि गाय ऐसा क्यों कर रही है।

इसी समय ब्रज की धार्मिक परंपरा के अनुसार ब्रह्मर्षि सौभरि परंपरा के महान संत गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी महाराज को स्वयं श्री दाऊजी महाराज ने उनके स्वप्न में दर्शन देकर अपने भूमिस्थ विग्रह के बारे में जानकारी दी। स्वप्न में प्रभु ने गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी महाराज को बताया कि वे विद्रुमवन में प्राचीन वटवृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं और उनकी सेवा-पूजा पुनः प्रारंभ करने का समय आ गया है। प्रभु के इस दिव्य आदेश को प्राप्त करने के बाद गोस्वामी जी महाराज ने उस स्थान की खोज की। गोस्वामी जी के द्वारा बताए जाने पर जब वटवृक्ष के नीचे उस स्थान की खुदाई की गई, तो वहाँ से श्री दाऊजी महाराज और माता रेवती जी के दिव्य विग्रह प्रकट हुए। इस घटना को बलदेव धाम में श्री दाऊजी महाराज के पुनः प्राकट्य की महत्वपूर्ण धार्मिक घटना माना जाता है।

कहा जाता है कि जिस स्थान पर गाय प्रतिदिन अपना दूध अर्पित करती थी, वही स्थान बाद में श्री दाऊजी महाराज के प्रकट होने का पवित्र स्थल सिद्ध हुआ। इस कारण गाय द्वारा स्वतः दूध अर्पित किए जाने की कथा आज भी दाऊजी महाराज के भक्तों के बीच श्रद्धा और भक्ति के साथ सुनाई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह दिव्य प्राकट्य संवत् 1638 (1582 ई.) की मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन हुआ। इसके बाद श्री दाऊजी महाराज एवं माता रेवती जी की विधिवत सेवा-पूजा प्रारंभ हुई और धीरे-धीरे बलदेव धाम एक प्रमुख धार्मिक तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित होता गया।

॥ गोस्वामी वंश एवं सेवाधिकारियों की परंपरा ॥

गोस्वामी श्री गोकुलनाथ जी महाराज ने प्रकट हुए श्रीविग्रहों को गोस्वामी श्री कल्याणदेव जी को सौंपते हुए उनकी सेवा-पूजा के लिए प्रेरित किया। तभी से कल्याण देवाचार्य जी के वंशजों, अहिवासी ब्राह्मण सेवायतों के हाथों मंदिर की सेवा-पूजा और आंतरिक धार्मिक व्यवस्था की परंपरा निरंतर चली आ रही है। आज भी इसी वंश के वंशज मंदिर की सेवा-परंपरा के प्रमुख सेवायत हैं और मंदिर की धार्मिक सेवाओं एवं परंपरागत व्यवस्थाओं की बागडोर इन्हीं के हाथों में है।

॥ श्री दाऊजी महाराज का मूर्तिरूप ॥

पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र श्री वज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्यस्मृति और उनकी उपासना परंपरा को स्थापित करने के लिए चार देवविग्रह तथा चार देवियों की मूर्तियाँ स्थापित की थीं। स्थानीय परंपरा में श्रीबलदेव जी के वर्तमान विग्रह को उन्हीं में से एक माना जाता है। यह विग्रह कालांतर में भूमिस्थ हो गया था और बाद में पुनः प्रकट हुआ। पुरातत्व संबंधी मतों में इस मूर्ति को कुषाणकाल से पूर्व का माना गया है और इसके निर्माण काल को दो सहस्र वर्ष या उससे अधिक प्राचीन बताया गया है। ब्रजमंडल के प्राचीन देवस्थानों में श्रीबलदेव जी के विग्रह को अत्यंत प्राचीन माना जाता है।

बृजराज श्री दाऊजी महाराज का विग्रह देवालय में पूर्वाभिमुख लगभग दो फुट ऊँचे संगमरमर के सिंहासन पर स्थापित है। यह विशाल वैष्णव श्रीविग्रह लगभग 8 फुट ऊँचा और साढ़े तीन फुट चौड़ा बताया जाता है। इसका श्याम वर्ण है। भगवान के पीछे सात फनों वाला शेषनाग अपनी फणछाया से मुख्य विग्रह को आच्छादित किए हुए है। भगवान का विग्रह नृत्यमुद्रा में है। दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है और बाएँ हाथ में चषक सुशोभित है।

भगवान के विशाल नेत्र, भुजाओं में आभूषण, कलाई में कंडूला, मस्तक पर बारीक नक्काशी वाला मुकुट, पैरों में आभूषण, कटि में धोती, कान में कुण्डल और कंठ में वैजयंती माला का अंकन बताया जाता है। शेषनाग सिर के ऊपर से लेकर चरणों तक स्थित दिखाई देते हैं। शेषनाग के तीन वलय स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जिन्हें योगशास्त्र की कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। विग्रह के चरणों के समीप सुबल, तोष और श्रीदामा सखाओं के विग्रहों का भी उल्लेख मिलता है।

॥ माता श्री रेवती जी का दिव्य स्वरूप ॥

भगवान बलदेव जी के सामने दक्षिण भाग में लगभग दो फुट ऊँचे सिंहासन पर माता रेवती जी का विग्रह स्थापित है। माता रेवती जी भगवान बलदेव जी के चरणों की ओर उन्मुख दिखाई देती हैं, जिसे उनके पूर्ण सेवा-भाव का प्रतीक माना जाता है। माता रेवती जी का विग्रह लगभग पाँच फुट ऊँचा बताया जाता है। उनका दाहिना हाथ वरद मुद्रा में तथा वाम हाथ कमर के पास स्थित है। इस विग्रह में भी सर्पवलय का अंकन स्पष्ट दिखाई देता है। दोनों भुजाओं, कंठ और चरणों में आभूषणों का उत्कीर्णन है। उन्मीलित नेत्रों और दिव्य स्वरूप से माता रेवती जी का विग्रह अत्यंत शोभायमान प्रतीत होता है।

॥ औरंगजेब का माफीनामा ॥

स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार मुगल सम्राट औरंगजेब के समय मथुरा के केशवदेव मंदिर तथा महावन के प्राचीन देवस्थलों पर कार्रवाई के बाद बलदेव स्थित श्रीदाऊजी मंदिर की प्रसिद्धि भी उसके कानों तक पहुँची। परंपरा के अनुसार उसने श्रीदाऊजी महाराज के विग्रह को नष्ट करने के उद्देश्य से सेना के साथ चल दिया। कथा के अनुसार सेना बलदेव की ओर निरंतर बढ़ती रही। जब भी बलदेव की दूरी पूछी जाती, लगभग ढाई (2.5) कोस ही बताई जाती थी। इससे सेना को यह स्थान असाधारण धार्मिक प्रभाव वाला प्रतीत हुआ। स्थानीय मान्यता के अनुसार जब सेना आगे बढ़ी तो भौरों और ततैयों (बेर्रा) का एक विशाल झुंड सेना पर टूट पड़ा। इस घटना में अनेक सैनिक और घोड़े घायल हुए तथा बड़ी संख्या में सैनिकों के मारे जाने की कथा प्रचलित है। इसके बाद औरंगजेब ने मंदिर की धार्मिक प्रतिष्ठा को स्वीकार करते हुए मंदिर के लिए पाँच गाँव की माफी तथा एक विशाल नक्कारखाना प्रदान करने का शाही फरमान जारी किया। नक्कारखाने की व्यवस्था के लिए राजकोष से प्रतिवर्ष धन देने का आदेश भी बताया जाता है। मंदिर परिसर में स्थित नक्कारखाना आज भी इस ऐतिहासिक परंपरा की स्मृति के रूप में देखा जाता है।

स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के अनुसार बाद में इस फरमान का नवीनीकरण शाह आलम के समय हुआ और सन् 1796 फसली की खरीफ में दो गाँव और बढ़ाकर कुल सात गाँव किए गए। इन गाँवों में खड़ेरा, छवरऊ, नूरपुर, अरतौनी और रीढ़ा आदि के नामों का उल्लेख मिलता है। यह व्यवस्था तत्कालीन क्षेत्रीय प्रशासक वज़ीर नज़फखाँ बहादुर के हस्ताक्षर तथा शाही मुहर के माध्यम से प्रसारित किए जाने की परंपरा से जुड़ी है। शाह आलम द्वारा चैत्र सुदी 3, संवत् 1840 को अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर से पृथक आदेश जारी किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

शाह आलम के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया राजवंश का अधिकार हुआ। स्थानीय विवरण के अनुसार सिंधिया शासकों ने मंदिर से संबंधित जागीर को यथास्थान बनाए रखा तथा भोग-राग, माखन-मिश्री और मंदिर के रख-रखाव के लिए राजकोष से धन देने की स्वीकृति प्रदान की। यह स्वीकृति भाद्रपद वदी चौथ, संवत् 1845 को गोस्वामी कल्याण देव जी के वंशजों गोस्वामी हंसराज जी एवं जगन्नाथ जी को दिए जाने का उल्लेख मिलता है। स्थानीय परंपरा में मंदिर से संबंधित जमींदारी एवं अधिकारों को श्री दाऊजी महाराज तथा कल्याण वंशजों, जिन्हें मंदिर के पंडा-पुरोहित कहा जाता है, से संबद्ध बताया जाता है।

मुगलकाल से संबंधित एक विशिष्ट मान्यता यह है कि सम्पूर्ण महावन तहसील के गाँवों में श्री दाऊजी महाराज के नाम से पृथक देवस्थान खाते की मालगुजारी शासन द्वारा वसूल कर मंदिर को भेंट की जाती थी। यह व्यवस्था आगे चलकर “शाही ग्रांट” के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्थानीय परंपरा में इसे मुगल काल से चली आ रही मंदिर की धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

॥ ब्रिटिश शासन काल में मंदिर ॥

ब्रिटिश शासनकाल में भी श्री दाऊजी महाराज का मंदिर धार्मिक एवं सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार ब्रज का यह मंदिर देशभक्तों और स्वतंत्रता प्रेमियों के जमावड़े का केंद्र रहा तथा उनके लिए सहायता और शरण का स्थान भी माना जाता था। जब ब्रिटिश प्रशासन को इस गतिविधि की जानकारी हुई तो मंदिर के सेवायतों और पंडा-पुरोहितों को स्वतंत्रता प्रेमियों को शरण न देने की चेतावनी दी गई। स्थानीय विवरणों के अनुसार मंदिर के सेवायतों ने इस निर्देश का पालन नहीं किया। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने मंदिर को पूर्व शाही परिवारों से प्राप्त जागीरों, भूमि और व्यवस्थाओं पर कार्रवाई करते हुए 31 दिसंबर 1841 को स्पेशल कमिश्नर के आदेश से इन्हें कुर्क एवं जब्त कर लिया तथा मंदिर पर पहरा बैठा दिया।

किले जैसी मजबूत प्राचीरों से घिरे मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों को रोकना कठिन था। स्थानीय परंपरा के अनुसार स्वतंत्रता संग्रामी दर्शनार्थी के रूप में मंदिर में आते और मंदिर में चलने वाले सदावर्त एवं भोजन व्यवस्था का लाभ लेते हुए अपनी गतिविधियों का संचालन करके वापस चले जाते थे। इस प्रकार मंदिर का धार्मिक स्वरूप उस समय भी समाज और यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण बना रहा।

॥ श्री बलदेव-रेवती जी की दिव्य झाँकी एवं श्रृंगार ॥

भगवान बलदेव जी का श्याम वर्ण का विशाल विग्रह अपने आकर्षक स्वरूप और अलौकिक प्रभाव के कारण भक्तों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। भक्तों की मान्यता है कि भगवान के श्रीविग्रह के जिस कोण से भी दर्शन किए जाएँ, ऐसा अनुभव होता है मानो प्रभु की दृष्टि सीधे भक्त की ओर ही हो। भगवान बलदेव जी के पीछे शेषनाग अपने फनों को फैलाए हुए विराजमान हैं। प्रभु नृत्यमुद्रा में हैं। उनका दाहिना हाथ वरद मुद्रा में सिर से ऊपर उठा हुआ है और बाएँ हाथ में चषक सुशोभित है। भगवान के चरणों में सुबल, तोष और श्रीदामा सखाओं के विग्रह विराजमान हैं। भगवान बलदेव जी की भुजाओं में कडूला आदि आभूषण, कानों में कुण्डल और कंठ में वैजयंती माला सुशोभित रहती है तथा कटि में धोती धारण कराई जाती है।

प्रभु के मस्तक पर बारीक नक्काशी वाला मुकुट शोभित होता है। विभिन्न अवसरों पर भगवान को किरीट, पाग, बाँक-चंद्रिका, मुकुट, जामा, चोली, पटुका, फेंटा और लकुट आदि धारण कराए जाते हैं। नित्य श्रृंगार में कंठा, बगनखा, कठुला, हार, मुक्तामाला, करधनी, कडूला और सिरपेच जैसे अनेक आभूषण सम्मिलित होते हैं। उत्सवों और विशेष पर्वों पर भगवान को विशेष आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। केसर और कपूर से युक्त सुगंधित इत्र तथा चंदन का लेपन भी सेवा परंपरा का हिस्सा है। हल और मूसल भगवान बलदेव जी की विशेष पहचान हैं। दशहरे के दिन इन्हें विशेष सेवा में धारण कराया जाता है। माता रेवती जी का भी विभिन्न अवसरों पर विशेष श्रृंगार किया जाता है। उनके मस्तक पर किरीट, तिलक तथा सौभाग्य के प्रतीक विभिन्न आभूषण, जैसे नथ आदि धारण कराकर विधिपूर्वक दिव्य श्रृंगार किया जाता है।

॥ अलौकिक राजसी भोग, दैनिक सेवा एवं आरती का दिव्य चक्र ॥

बलदेव मंदिर में दैनिक सेवा और भोग का क्रम ब्रज की राजसी तथा वैष्णव सेवा परंपराओं के अनुसार संचालित होता है। विभिन्न प्रहरों में भगवान के मंगला दर्शन, बाल भोग, श्रृंगार, राजभोग, उत्थापन, विजया भोग, संध्या आरती और शयन सेवा संपन्न होती है।

प्रातःकाल मंगला एवं बाल भोग

प्रातःकाल ग्रीष्म ऋतु में लगभग छह बजे और शीत ऋतु में लगभग सात बजे मंगला दर्शन होते हैं। पद्य, अर्घ्य, आचमन और मार्जन-स्नान आदि की सेवा के बाद भगवान को अंगोछा तथा अन्य वस्त्र धारण कराए जाते हैं। श्री दाऊजी महाराज की श्रृंगार सेवा से जुड़ी एक विशेष एवं अनूठी परंपरा है। मान्यता है कि एक बार श्री दाऊजी महाराज को जिस श्रृंगार में सजाया जाता है, उस श्रृंगार को पुनः दोबारा धारण नहीं कराया जाता। प्रत्येक बार उनके लिए नवीन श्रृंगार की सेवा की जाती है। इसके पश्चात बाल भोग लगाया जाता है, जिसमें ताजा माखन और मिश्री विशेष रूप से अर्पित की जाती है। साथ ही होली एवं भक्ति के पदों का गायन होता है। बाल भोग के बाद श्रृंगार आरती के दर्शन होते हैं। दोपहर लगभग बारह बजे राजभोग अर्पित किया जाता है। इस दौरान मंदिर में पदों का गायन और वादन चलता रहता है।

भगवान बलदेव जी को मुख्य रूप से पक्का भोग प्रिय माना जाता है। इसमें शुद्ध घी की पूरी, सब्जी, मलाईदार खीर, बासोंदी, रायता, मोहनभोग, हलुआ और ब्रज के प्रसिद्ध लड्डू आदि सम्मिलित होते हैं। मार्गशीर्ष पूर्णिमा, संवत् 1638 को भगवान के प्राकट्य के समय सर्वप्रथम खीर अर्थात् क्षीर का भोग अर्पित किए जाने की धार्मिक परंपरा बताई जाती है। तभी से मंदिर की भोग परंपरा में खीर का विशेष महत्व माना जाता है। राजभोग के बाद आचमन और तांबूल आदि निवेदित किए जाते हैं। इसके बाद भगवान अनोसर अर्थात् विश्राम करते हैं और मंदिर के पट बंद रहते हैं।

उत्थापन एवं विजया भोग

शीत ऋतु में लगभग तीन बजे तथा ग्रीष्म ऋतु में लगभग चार बजे पुनः दर्शन और झाँकी प्रारंभ होती है। उत्थापन भोग में फल-मेवा तथा विशेष विजया अर्थात् भांग का भोग लगाया जाता है। लोकपरंपरा में भाँग का भोग लगाते समय भक्त भावपूर्वक कहते हैं—

“दाउदयाल ब्रज के राजा, भाँग पीवे तो यहाँ पे आजा।”
संध्या आरती एवं रात्रि शयन भोग

सायंकाल मंदिर में पद-गायन और समाज का कार्यक्रम होता है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ भव्य संध्या आरती संपन्न होती है। शीत ऋतु में रात्रि लगभग आठ बजे तक और ग्रीष्म ऋतु में लगभग नौ बजे तक दर्शन खुले रहने की परंपरा है। इसके बाद भगवान का श्रृंगार उतारा जाता है। आचमन, बीरी आदि की सेवा के पश्चात गरमा-गरम पूरी, सब्जी और मलाईदार मीठे दूध का अंतिम भोग लगाया जाता है। शयन एवं विनय के पदों का गायन होने के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

॥ वैष्णव सेवा परंपरा एवं गोस्वामियों की ओसरा व्यवस्था ॥

दाऊजी मंदिर की पूजा-पद्धति पर वल्लभ संप्रदाय और पुष्टिमार्गीय परंपरा का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। समय और अवसर के अनुसार विभिन्न राग-रागिनियों के माध्यम से भगवान के गुणों का गायन किया जाता है। मंदिर की सेवा-पूजा में रामानुज, राधावल्लभ, राधारमण और निम्बार्क आदि वैष्णव परंपराओं के प्रभाव का भी उल्लेख मिलता है। दाऊजी मंदिर में गोस्वामियों और सेवाधिकारियों की सेवा परंपरागत रूप से निर्धारित ओसरा के अनुसार होती है। जिस दिन जिस गोस्वामी परिवार का ओसरा आता है, उस दिन संबंधित परिवार अपने संबंधियों, प्रियजनों और विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित करता है तथा राजभोग, प्रसाद और विजया की विशेष व्यवस्था की जाती है। यह दिन संबंधित परिवार के लिए किसी बड़े धार्मिक उत्सव के समान माना जाता है।

॥ मंदिर की स्थापत्य कला एवं ऐतिहासिक धरोहर ॥

श्री दाऊजी महाराज मंदिर लगभग पाँच एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ बताया जाता है। इसके स्थापत्य में राजपूत, ब्रज और ईरानी स्थापत्य कला का सुंदर और भव्य संगम दिखाई देता है। इसकी विशाल प्राचीरें, ऊँचे फाटक और किला-नुमा ढाँचा इसे विशिष्ट रूप प्रदान करते हैं। मंदिर के चारों ओर बाजार और परिक्रमा मार्ग मंदिर को एक जीवंत धार्मिक नगर का स्वरूप प्रदान करते हैं। मंदिर परिसर का प्रमुख आकर्षण यहाँ का शाही नक्कारखाना भी है, जिसे मुगलकालीन स्थापत्य से जोड़ा जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के अनुसार इसका निर्माण संवत् 1729 (1672 ई.) में कराया गया था।

विग्रहों के प्राकट्य के बाद प्रारंभ में उन्हें पर्णकुटी में रखा गया था। इसके बाद श्री वल्लभाचार्य जी के पौत्र गोस्वामी श्री गोकुलनाथ जी महाराज द्वारा संवत् 1639 (1583 ई.) में मंदिर बनवाकर इनकी पुनः प्रतिष्ठा किए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में दिल्ली के प्रसिद्ध धर्मात्मा व्यापारी सेठ श्यामदास जी द्वारा संवत् 1689 (1633 ई.) में वर्तमान विशाल मंदिर के निर्माण की परंपरा बताई जाती है। मंदिर से संबंधित विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में निर्माण और जीर्णोद्धार के अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, जिन्हें बलदेव धाम की स्थापत्य यात्रा के विभिन्न चरणों के रूप में देखा जाता है।

॥ बलभद्र कुंड – क्षीरसागर ॥

बलदेव में मुख्य आकर्षण श्री दाऊजी महाराज का मंदिर है, किंतु इसके अतिरिक्त बलभद्र कुंड, जिसे क्षीरसागर भी कहा जाता है, प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह तालाब लगभग 80 गज चौड़ा और 80 गज लंबा बताया जाता है। इसके चारों ओर पक्के घाट बने हुए हैं। स्थानीय विवरण के अनुसार इसके जल में सदैव काई या शैवाल की परत दिखाई देती है, जो दूध पर जमी मलाई के समान प्रतीत होती है। दर्शनार्थी इस सरोवर में स्नान एवं आचमन करते हैं और इसके बाद श्री दाऊजी महाराज के दर्शन के लिए जाते हैं।

॥ श्री दाऊजी महाराज का प्रमुख प्रसाद ॥

श्री दाऊजी महाराज के मंदिर का मुख्य प्रसाद माखन और मिश्री है। इसके साथ खीर का भी विशेष महत्व है। धार्मिक परंपरा में खीर को भगवान के नित्य भोग से जोड़ा जाता है। भगवान को विभिन्न अवसरों पर पूरी, सब्जी, खीर, बासोंदी, रायता, मोहनभोग, हलुआ, लड्डू, फल-मेवा आदि अनेक प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। विजया अर्थात् भांग का भोग भी मंदिर की स्थानीय सेवा परंपरा का एक विशिष्ट पक्ष है।

॥ दर्शन का समयक्रम ॥

मंदिर में दर्शन का समय मौसम के अनुसार बदलता है।

अवधि प्रातः दर्शन दोपहर दर्शन सायंकाल / रात्रि दर्शन
अक्षय तृतीया से हरियाली तीज 6 बजे से 11:30 बजे तक 4 बजे से 5 बजे तक 6:30 बजे से 9 बजे तक
हरियाली तीज के बाद 6:30 बजे से 12 बजे तक 3 बजे से 4 बजे तक 6:00 बजे से 8:30 बजे तक

गर्मी में अक्षय तृतीया से हरियाली तीज तक प्रातः लगभग 6 बजे से 11:30 बजे तक, दोपहर में 4 बजे से 5 बजे तक तथा सायंकाल 6:30 बजे से 9 बजे तक दर्शन होने की परंपरा बताई जाती है।

हरियाली तीज के बाद प्रातः लगभग 6:30 बजे से 12 बजे तक, दोपहर में 3 बजे से 4 बजे तक तथा रात्रि में लगभग 6:00 बजे से 8:30 बजे तक दर्शन होने का उल्लेख मिलता है।

विशेष पर्व, मेले और उत्सवों के दौरान दर्शन का समय एवं व्यवस्था अलग हो सकती है।

॥ दर्शनार्थ आने वाले प्रमुख महापुरुष एवं व्यक्तित्व ॥

स्थानीय विवरणों के अनुसार अनेक प्रसिद्ध महापुरुष, राजनेता, साहित्यकार और विशिष्ट व्यक्तित्व श्री दाऊजी महाराज के दर्शन के लिए बलदेव आ चुके हैं।

इनमें प्रमुख रूप से—

  • महामना मदन मोहन मालवीय जी
  • पंडित मोतीलाल नेहरू
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू
  • मोहनदास करमचंद गांधी (बापू)
  • माता कस्तूरबा गांधी
  • राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद
  • राजवंशी देवी जी
  • डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
  • सरदार वल्लभभाई पटेल
  • मोरारजी देसाई
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय
  • भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र जी
  • हरिओम जी
  • निराला जी
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बांग्चू
  • के. एन. जी. जैसे महापुरुष

इन विशिष्ट व्यक्तित्वों के आगमन से भी बलदेव धाम की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का परिचय मिलता है।

॥ श्री दाऊजी महाराज मंदिर बलदेव कैसे पहुँचें ॥

श्री दाऊजी धाम मथुरा-एटा राजमार्ग पर स्थित एक प्रमुख धार्मिक नगर है। वर्षभर देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।

सड़क मार्ग द्वारा

बलदेव धाम मुख्य मथुरा-एटा राजमार्ग पर स्थित है। दिल्ली, नोएडा या आगरा से आने वाले श्रद्धालु यमुना एक्सप्रेसवे के माध्यम से उपयुक्त इंटरचेंज से उतरकर सड़क मार्ग द्वारा बलदेव पहुँच सकते हैं। मथुरा शहर से बलदेव की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है। मथुरा से नियमित बसें, ऑटो, टैक्सी और अन्य स्थानीय परिवहन साधन उपलब्ध रहते हैं।

रेल मार्ग द्वारा

बलदेव के लिए सबसे निकट प्रमुख रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन (MTJ) है। मथुरा जंक्शन देश के अनेक प्रमुख शहरों से सुपरफास्ट और अन्य रेल सेवाओं द्वारा जुड़ा हुआ है। स्टेशन के बाहर से बलदेव के लिए टैक्सी, ऑटो और अन्य स्थानीय परिवहन सेवाएँ आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं।

हवाई मार्ग द्वारा

बलदेव धाम के लिए प्रमुख हवाई कनेक्टिविटी में आगरा एयरपोर्ट, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर तथा इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली शामिल हैं। आगरा एयरपोर्ट से बलदेव की दूरी विभिन्न सड़क मार्गों के अनुसार लगभग 50 किलोमीटर बताई जाती है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर से बलदेव की दूरी लगभग 100 किलोमीटर के आसपास बताई जाती है, जबकि वास्तविक सड़क दूरी चुने गए मार्ग के अनुसार अलग हो सकती है। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली से बलदेव की दूरी लगभग 180 किलोमीटर बताई जाती है। दिल्ली एयरपोर्ट से यमुना एक्सप्रेसवे एवं आगे सड़क मार्ग के माध्यम से कैब या निजी वाहन द्वारा बलदेव धाम पहुँचा जा सकता है। हवाई मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं को यात्रा से पहले वर्तमान सड़क मार्ग, दूरी और यातायात की स्थिति की जानकारी अवश्य देख लेनी चाहिए।

दाऊजी मंदिर की प्रमुख विशेषताएं

प्राचीन धार्मिक परंपरा

दाऊजी महाराज

माता रेवती जी

प्रसिद्ध हुरंगा