गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी

गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी

वह संत जिन्हें भगवान ने स्वयं पुकारा

ब्रह्मर्षि सौभरि वंश परंपरा के महान संत गोस्वामी श्री कल्याण देवाचार्य जी महाराज का नाम बलदेव धाम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह वही महापुरुष हैं जिन्हें स्वयं भगवान दाऊजी महाराज ने स्वप्न में दर्शन देकर अपने भूमिस्थ विग्रह के विषय में दिव्य आदेश दिया था।

ब्रज की पावन भूमि पर संवत् 1595 में श्री कल्याण देव जी का जन्म एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ। बचपन से ही उनका मन भक्ति और तपस्या में लगा रहता था। किशोरावस्था में उन्होंने कठोर तपस्या कर श्री सूर्यदेव की उपासना की।

मान्यता है कि उनकी अनन्य तपस्या से प्रसन्न होकर श्री दाऊजी महाराज ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए और अपने विग्रह के प्राकट्य का संकेत दिया। इसके बाद श्री कल्याण देव जी को विद्रुमवन में वटवृक्ष के नीचे श्री दाऊजी महाराज एवं माता रेवती जी के दिव्य विग्रह प्राप्त हुए।

विग्रहों को अन्य स्थान ले जाने का प्रयास किया गया, लेकिन वे वहीं स्थापित होने के संकेत देने लगे। इसके बाद संवत् 1638 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन श्री दाऊजी महाराज एवं माता रेवती जी के विग्रहों की विधिवत पूजा कर पर्णकुटी में स्थापना की गई।

आगे चलकर श्री कल्याण देव जी की सेवा और भक्ति से इसी पावन स्थान पर श्री दाऊजी महाराज का भव्य मंदिर स्थापित हुआ। उनकी तपस्या, भक्ति और सेवा की परंपरा आज भी श्री दाऊजी महाराज की आराधना से जुड़ी हुई मानी जाती है।

॥ श्री कल्याण देव जी का जन्म और पारिवारिक परिचय ॥

श्री कल्याण देव जी का जन्म संवत् 1595 में ब्रजमंडल में श्री गिरिराज जी की तलहटी में बसे पावन ग्राम भरनाखुर्द में पंडित अभयराम जी के घर हुआ था। उनके पिता एक साधारण किसान थे। परिवार धार्मिक संस्कारों से जुड़ा हुआ था। बालक कल्याण के जन्म के पश्चात परिवार में शुभ परिवर्तन और प्रसन्नता का अनुभव हुआ। इसी कारण उनका नाम कल्याण रखा गया।

श्री कल्याण देव जी के परदादा पंडित पृथ्वीराज शर्मा मूल रूप से राजस्थान स्थित तगारा गांव के निवासी बताए जाते हैं। परंपरा के अनुसार तगारा गांव में महर्षि सौभरि जी की आठवीं पत्नी तगन्या का महल था। इसी कारण तगारा गांव का नाम तगन्या के नाम का अपभ्रंश रूप माना जाता है। पंडित पृथ्वीराज शर्मा, महर्षि सौभरि जी की पत्नी तगन्या के वंशज के हैं।

एक समय तगारा गांव भयंकर प्लेग की चपेट में आ गया। पूरा गांव लगभग खाली हो गया और गांववासी अपनी सुरक्षा के लिए अलग-अलग स्थानों पर जाकर बस गए। इसी कठिन कालखंड से बचने के लिए पंडित पृथ्वीराज शर्मा ब्रजमंडल के भरनाखुर्द गांव में आकर बस गए। कहा जाता है कि भरनाखुर्द गांव पहले से ही सौभरेय ब्राह्मणों से जुड़ा हुआ था। तगारा गांव से आकर यहां बसने वाले लोगों ने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने मूल गांव का नाम भी अपने नाम के साथ लिखना शुरू किया। इसी कारण वे आगे चलकर तगारे कहलाने लगे। वर्तमान में तगारे शब्द को कई स्थानों पर गोत्र की तरह भी जाना जाता है, जबकि परंपरा के अनुसार उनका मूल गोत्र अंगीरस है।

॥ भरनाखुर्द का प्राचीन सूरज मंदिर और सूरज कुंड ॥

भरनाखुर्द की धार्मिक एवं प्राचीन पहचान से जुड़े प्रमुख स्थलों में सूरज मंदिर और सूरज कुंड का विशेष उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार सूरज कुंड लगभग 20 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत था और इसे पाताल-तोड़ कुंड माना जाता है। पुरानी ब्रज लोकपरंपराओं में ब्रज और आसपास के क्षेत्रों में इस प्रकार के लगभग 12 कुंडों का उल्लेख मिलता है। लोककथाओं के अनुसार महाभारत के भीषण युद्ध के समय बड़ी संख्या में सेना के लिए जल की व्यवस्था इन्हीं कुंडों के माध्यम से हुई थी। समय के साथ इनमें से अधिकांश कुंड अतिक्रमण की समस्या से प्रभावित हुए। सूरज कुंड को ब्रज की लोककथाओं में श्री राधा और श्री कृष्ण के आत्मीय मिलन का साक्षी भी माना जाता है। मान्यता है कि श्री राधा जी इसी कुंड में स्नान कर प्रतिदिन सूर्य भगवान की आराधना करती थीं। कुंड के आसपास मौजूद प्राकृतिक स्थलों को लेकर आज भी श्रद्धालुओं के बीच अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

॥ सिद्ध बाबा की तपस्या और श्री राधा जी की कृपा ॥

पंडित अभयराम जी की पत्नी और श्री कल्याण देव जी की माता सुशीला देवी जी इसी गांव में स्थित एक सिद्ध बाबा के आश्रम में कीर्तन करने जाया करती थीं। इन सिद्ध बाबा के संबंध में बंगाली साहित्य और ब्रज की धार्मिक परंपराओं में एक रोचक कथा मिलती है।

मान्यता के अनुसार बाबा ने बाल विवाह के तुरंत बाद अपना घर छोड़ दिया था और ब्रजधाम के राधाकुंड चले गए थे। भरनाखुर्द गांव राधाकुंड की गोद में बसा हुआ बताया जाता है और वहीं एक सिद्ध आश्रम में बाबा भजन एवं साधना में लीन हो गए। जब उनकी बाल वधू को उनके घर छोड़ने का पता चला तो वह उन्हें खोजते हुए राधाकुंड पहुंची। उस समय बाबा एक गुफा में ध्यानमग्न थे। वधू ने उनसे निवेदन किया कि वह उनकी साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं बनना चाहतीं और केवल एक बार उनके दर्शन करके वापस चली जाएंगी। लेकिन बाबा मोह के भय से गुफा से बाहर नहीं आए। तब वधू ने उन्हें श्राप दिया कि वे कोढ़ रोग से पीड़ित हो जाएं। कुछ समय बाद बाबा को भयंकर कोढ़ हो गया। एक दिन पीड़ा से व्याकुल होकर बाबा ने श्री राधा जी का स्मरण किया। मान्यता है कि श्री राधा जी उनके समक्ष प्रकट हुईं और कहा कि उनकी पत्नी भी उनसे कम तपस्विनी नहीं थी। पत्नी के साथ-साथ उन्होंने एक नारी का भी अपमान किया है, इसलिए उन्हें श्राप का फल भोगना होगा।

श्री राधा जी ने बाबा को बताया कि यदि वे छह महीने तक गांव की 24 घंटे नंगे पैर परिक्रमा करेंगे, जहां सूर्यास्त होगा वहीं रुकेंगे, सुबह पुनः परिक्रमा शुरू करेंगे और ब्रजवासियों द्वारा दिए गए प्रसाद को स्वीकार करेंगे, तो उनका रोग ठीक हो जाएगा। श्री राधा जी के अंतर्ध्यान होने के बाद बाबा ने उसी समय परिक्रमा आरंभ कर दी। तपती दोपहर, गर्म भूमि और पैरों में पड़े घावों के बावजूद वे परिक्रमा करते रहे। मान्यता है कि छह महीने की इस साधना के बाद उनका कोढ़ ठीक हो गया। इसके बाद वे प्रतिदिन बरसाने जाकर श्री राधा जी के दर्शन करते और उनके प्रति आभार व्यक्त करते थे।

॥ माता सुशीला देवी जी को मिला आशीर्वाद और श्री कल्याण देव जी का जन्म ॥

एक दिन प्रातःकाल सिद्ध बाबा बरसाने से अपने आश्रम लौट रहे थे। उसी समय माता सुशीला देवी जी अपने पति पंडित अभयराम जी के लिए खेत की ओर भोजन लेकर जा रही थीं। उनके पास भोजन बहुत कम था। माता सुशीला देवी जी ने बाबा को प्रणाम किया। बाबा ने उनसे कहा कि आज वे उन्हें थोड़ा भोजन करा दें। माता सुशीला देवी जी संकोच में पड़ गईं, क्योंकि भोजन उनके पति के लिए भी पर्याप्त नहीं था। तब बाबा ने कहा कि संकोच मत करो, इस डिब्बे में बहुत भोजन है। जब डिब्बा खोला गया तो वह पूरी और पकवानों से भरा हुआ था। माता सुशीला देवी जी इस घटना को देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। बाबा ने थोड़ा भोजन लिया और माता सुशीला देवी जी को "कल्याण हो" का आशीर्वाद देकर वहां से विदा कर दिया। माता सुशीला देवी जी ने यह पूरी घटना अपने पति पंडित अभयराम जी को बताई। इसके बाद परिवार के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होने लगे। कुछ समय बाद माता सुशीला देवी जी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया। यह बालक परिवार के लिए अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध हुआ, इसलिए उसका नाम कल्याण रखा गया। यह घटना संवत् 1595 की है।

॥ 15 वर्ष की आयु में शुरू हुई कठोर तपस्या ॥

श्री कल्याण देव जी बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। मात्र 15 वर्ष की आयु में वे परम तपस्वी बन गए। संवत् 1610 में उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ की। वे सूर्य भगवान के सामने घंटों बैठकर ध्यान और साधना में लीन रहते थे। लगभग पांच वर्षों की निरंतर साधना के बाद, संवत् 1615 में उन्हें सिद्धि प्राप्त होने की मान्यता है। एक दिन श्री कल्याण देव जी को ऐसी अनुभूति हुई कि मानो उन्हें मथुरा तीर्थाटन का आदेश प्राप्त हो रहा हो। कुछ समय तक वे विचार करते रहे, लेकिन मथुरा जाने की भावना उनके मन से दूर नहीं हुई। अंततः उन्होंने मथुरा तीर्थाटन का निश्चय किया और घर से प्रस्थान कर दिया। सबसे पहले उन्होंने श्री गिरिराज जी की परिक्रमा की, फिर मानसी गंगा में स्नान किया। इसके बाद वे मथुरा नगरी पहुंचे और श्री यमुना जी में स्नान कर भगवान के दर्शन किए। मथुरा से आगे बढ़ते हुए वे विद्रुमवन पहुंचे, जिसे वर्तमान में बलदेव नगर के रूप में जाना जाता है। विद्रुमवन में उन्होंने रात्रि विश्राम किया। सघन वटवृक्षों की छाया और यमुना जी का शांत किनारा उन्हें अत्यंत प्रिय लगा। उन्होंने कुछ समय वहीं रहकर तपस्या करने का निश्चय कर लिया।

॥ श्री बलराम दाऊजी महाराज ने दिए दिव्य दर्शन ॥

एक दिन नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद श्री कल्याण देव जी साधना में थे। तभी उनके सामने दिव्य हल-मूसल धारण किए भगवान श्री बलराम प्रकट हुए। भगवान ने कहा कि वे उनकी तपस्या से प्रसन्न हैं और उन्हें वर मांगने का अवसर प्रदान किया। कल्याण देव जी ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और कहा कि उन्हें किसी सांसारिक वस्तु की इच्छा नहीं है। वे केवल श्री दाऊजी महाराज के नित्य दर्शन चाहते हैं और चाहते हैं कि भगवान उनके घर में नित्य विराजमान रहें। श्री बलदेव जी ने उन्हें “तथास्तु” कहकर आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गए। भगवान ने यह भी कहा कि जिस प्रयोजन से वे मथुरा यात्रा पर निकले हैं, उस यात्रा के सभी फल उन्हें यहीं प्राप्त होंगे।

इसके साथ ही श्री दाऊजी महाराज ने उन्हें एक और दिव्य संकेत दिया कि वटवृक्ष के नीचे श्री दाऊजी महाराज एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं। उन्हें वहां से प्रकट करने का आदेश दिया गया। भगवान की आज्ञा मिलते ही श्री कल्याण देव जी अत्यंत व्यग्र हो उठे और उसी स्थान पर भूमि की खुदाई शुरू कर दी। वे उस स्थान को खोजने लगे जिसकी ओर श्री बलराम दाऊजी महाराज ने संकेत किया था।

॥ वटवृक्ष के नीचे से हुआ श्री दाऊजी और रेवती जी के विग्रह का प्राकट्य ॥

इसी समय गोकुल में भी एक अद्भुत घटना घट रही थी। मान्यता के अनुसार जिस समय श्री कल्याण देव जी को भगवान के दर्शन हुए, उसके पूर्व रात्रि में गोस्वामी गोकुलनाथ जी को एक दिव्य स्वप्न आया। स्वप्न में उन्हें बताया गया कि जिस श्यामा गाय को लेकर वे चिंतित हैं, वह निर्दोष है। वह प्रतिदिन एक निश्चित स्थान पर जाकर भगवान की भूमिस्थ प्रतिमा के ऊपर अपना दूध अर्पित करती है। स्वप्न में यह भी संकेत मिला कि श्री दाऊजी महाराज एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं विद्रुमवन में वटवृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं और उन्हें प्रकट कराया जाना चाहिए।

यह श्यामा गाय हाल ही में प्रसूता हुई थी, फिर भी दूध नहीं देती थी। जब ग्वाला सभी गायों को वन में चराने ले जाता तो श्यामा गाय एक निश्चित स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती। वहां पहुंचते ही उसके थनों से अपने आप दूध धरती पर गिरने लगता और कुछ ही क्षणों में उसके थनों में दूध नहीं रहता। इसी कारण ग्वाले पर संदेह किया जाने लगा था। लेकिन भगवान की आज्ञा और दिव्य स्वप्न के बाद गोस्वामी गोकुलनाथ जी ने उस स्थान पर जाने का निर्णय लिया। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि श्री कल्याण देव जी पहले ही भूमि से दोनों दिव्य विग्रहों को निकाल चुके हैं। दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया और अपने-अपने अनुभव सुनाए। इस प्रकार श्री कल्याण देव जी की तपस्या और गोकुलनाथ जी को मिले दिव्य स्वप्न की कथा एक ही स्थान पर आकर जुड़ गई।

इसके बाद विचार हुआ कि इन दिव्य विग्रहों को इस घने जंगल से निकालकर श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाए। विग्रहों को वहां से ले जाने के लिए अनेक लोगों के साथ 24 बैलों का भी सहारा लिया गया। लेकिन बहुत प्रयास करने के बाद भी दोनों विग्रह अपने स्थान से टस से मस नहीं हुए। अंततः सभी ने इसे भगवान की इच्छा का संकेत माना और निर्णय लिया कि जहां से श्री दाऊजी महाराज और माता रेवती जी का प्राकट्य हुआ है, वहीं उनकी स्थापना की जाएगी। इस प्रकार श्री कल्याण देव जी जिस स्थान पर तपस्या करते थे, उसी पर्णकुटी में दोनों दिव्य विग्रहों की सर्वप्रथम स्थापना की गई। इस स्थापना के साथ श्री दाऊजी महाराज द्वारा श्री कल्याण देव जी को दिए गए उस वरदान की भी पूर्ति हुई, जिसमें भगवान ने उनके घर में नित्य निवास करने का आश्वासन दिया था।

॥ मार्गशीर्ष पूर्णिमा को हुई पहली पूजा और खीर भोग की परंपरा ॥

विग्रहों की प्रथम स्थापना का दिन संयोग से मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा था। मान्यता के अनुसार यह संवत् 1638 विक्रम का दिन था। इस अवसर पर षोडशोपचार विधि और वेदाचार के अनुरूप दोनों दिव्य विग्रहों की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। सबसे पहले श्री ठाकुरजी को खीर का भोग अर्पित किया गया। इसी कारण उस दिन से लेकर आज तक श्री दाऊजी महाराज के भोग में खीर को विशेष स्थान प्राप्त होने की धार्मिक परंपरा बताई जाती है।

गोस्वामी गोकुलनाथ जी ने यहां एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार उठाने का संकल्प लिया, जबकि श्री कल्याण देव जी ने पूजा-अर्चना की सेवा का दायित्व स्वीकार किया। परंपरा के अनुसार उसी समय से आज तक कल्याण देव जी के वंशज श्री दाऊजी महाराज की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। संवत् 1638 की मार्गशीर्ष पूर्णिमा को पर्णकुटी में हुई प्रथम स्थापना के बाद मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ा। लगभग एक वर्ष के भीतर मार्गशीर्ष पूर्णिमा, संवत् 1639 को दोनों दिव्य विग्रहों को पर्णकुटी से नवनिर्मित देवालय में विधिवत प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह मंदिर भक्तों के लिए आवश्यक सुविधाओं से युक्त बनाया गया और यहीं से श्री दाऊजी महाराज की नियमित पूजा-अर्चना की परंपरा और अधिक व्यवस्थित रूप में आगे बढ़ी।

॥ विद्रुम वन – श्री बलराम जी का जन्मस्थान ॥

भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलराम जी का जन्म रहस्यमयी और दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, जब देवकी जी के गर्भ में सातवाँ बालक आया, तब योगमाया ने उस बालक को देवकी जी के गर्भ से निकालकर वसुदेव जी की ज्येष्ठ पत्नी माता रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। इसी कारण भगवान बलराम जी को संकर्षण भी कहा जाता है। उस समय माता रोहिणी कंस के अत्याचार और भय के कारण गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के संरक्षण में रह रही थीं। भगवान बलराम जी के जन्म का समय निकट आने पर माता रोहिणी को गोकुल के समीप स्थित एक पवित्र स्थान विद्रुम वन में ले जाया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली, शांति और पवित्र वातावरण से युक्त था तथा नंद बाबा की गायें भी इसी क्षेत्र में विचरण करती थीं। विद्रुम वन के समीप अवैरनी नामक एक स्थान का भी उल्लेख मिलता है। परंपरा में इस स्थान को वैर और द्वेष से रहित, शांत तथा सुरक्षित क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। कंस के अत्याचारों से दूर होने के कारण यह स्थान माता रोहिणी के लिए सुरक्षित माना गया।

भगवान बलराम जी के जन्म के संबंध में परंपरागत रूप से निम्न श्लोक का उल्लेख किया जाता है—

शुभे भाद्रपदे मासे, ह्यागते पुण्ययोगतः।
षष्ठ्याम् तिथौ शुक्लपक्षे मध्याह्ने वृष्चि लग्नके।
रोहिण्याम् च स्वयं जातो आदिशेषो महाबलः॥

परंपरागत धार्मिक ग्रंथों और गर्ग संहिता के अनुसार, इसी पावन प्रसंग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को दोपहर के समय माता रोहिणी के गर्भ से भगवान बलराम जी का प्राकट्य हुआ। भगवान बलराम जी को भगवान विष्णु के अनंत शेष का अवतार माना जाता है और वे अपनी अद्भुत शक्ति के कारण बलभद्र, बलदेव, हलधर और संकर्षण जैसे नामों से भी प्रसिद्ध हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान श्री बलराम जी, भगवान श्रीकृष्ण जी से लगभग 11 माह और कुछ दिन बड़े थे। भगवान बलराम जी का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को तथा भगवान श्रीकृष्ण जी का जन्म अगले साल उसी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माना जाता है। इस प्रकार दोनों भाइयों के जन्म के बीच लगभग 11 माह और कुछ दिनों का अंतर माना जाता है।

॥ श्री कल्याण देव जी की कथा क्यों विशेष है? ॥

श्री कल्याण देव जी की जीवनगाथा में भक्ति, तपस्या, त्याग, गुरु-परंपरा, दिव्य अनुभूति और भगवान की सेवा के अनेक प्रसंग मिलते हैं। उनकी कथा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने भगवान से सांसारिक सुख-संपत्ति नहीं मांगी, बल्कि केवल नित्य दर्शन और सेवा का अवसर मांगा। इसी अनन्य भक्ति की परंपरा को श्री दाऊजी महाराज के मंदिर की सेवा से जोड़ा जाता है। आज भी भक्त जब बलदेव धाम पहुंचते हैं, तो श्री दाऊजी महाराज के दर्शन के साथ उस संत परंपरा को भी स्मरण करते हैं, जिसे श्री कल्याण देव जी ने अपनी तपस्या और सेवा से आगे बढ़ाया।

दिव्य स्वप्न-आदेश की कथा

विदेशी आक्रमणों से भगवान के विग्रह की रक्षा से लेकर उनके पुनः प्राकट्य तक की अलौकिक घटना।

आक्रमण काल
विग्रह की सुरक्षा हेतु भूमिस्थ किया गया

मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों के समय श्री दाऊजी महाराज के विग्रह को सुरक्षित रखने हेतु उसे एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे भूमिस्थ कर दिया गया था।

कई वर्षों तक
गाय द्वारा दुग्धाभिषेक का चमत्कार

विग्रह भूमि के भीतर सुरक्षित रहा। इसी दौरान एक गाय प्रतिदिन उस स्थान पर आकर स्वतः अपने थनों से दूध की धारा बहाती थी — यह घटना स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी।

दिव्य स्वप्न
भगवान का साक्षात्कार एवं आदेश

स्वयं श्री दाऊजी महाराज ने गोस्वामी कल्याण देवाचार्य जी को स्वप्न में दर्शन देकर अपने भूमिस्थ विग्रह के विषय में जानकारी दी और उन्हें उचित सेवा-प्रतिष्ठा का आदेश दिया।

संवत् 1638 (1582 ई.), मार्गशीर्ष पूर्णिमा
विग्रह का पुनः प्राकट्य

प्रभु के आदेशानुसार इसी शुभ तिथि पर वटवृक्ष के नीचे से विग्रहों का पुनः प्राकट्य हुआ — यह घटनाक्रम बलदेव धाम की धार्मिक परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

तत्पश्चात
गोस्वामी गोकुलनाथ जी द्वारा सेवा का दायित्व

गोस्वामी श्री गोकुलनाथ जी महाराज ने प्रकट हुए श्रीविग्रहों को गोस्वामी कल्याण देव जी को सौंपते हुए उनकी सेवा-पूजा के लिए प्रेरित किया।

आज भी जीवंत परंपरा

तभी से कल्याण देवाचार्य जी के वंशजों तथा अहिवासी ब्राह्मण सेवायतों के हाथों मंदिर की सेवा-पूजा और आंतरिक धार्मिक व्यवस्था की परंपरा निरंतर चली आ रही है। आज भी इसी वंश के वंशज मंदिर की सेवा-परंपरा के प्रमुख सेवायत हैं।

मंदिर की सेवा-व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और दायित्वों की बागडोर इसी वंश के हाथों में है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही वंश इस प्राचीन सेवा-परंपरा का निर्वहन करता आ रहा है — "ओसरा" प्रणाली के अंतर्गत, जिसमें बारी-बारी से प्रत्येक गोस्वामी परिवार भगवान की सेवा का सौभाग्य प्राप्त करता है।

संपूर्ण इतिहास पढ़ें
वंश-परंपरा की मुख्य बातें
  • गोत्र: अंगिरस, ब्रह्मर्षि सौभरि परंपरा
  • समाज में 50 आस्पद, तगारे उपगोत्र प्रमुख
  • स्थानीय रूप से "पंडा जी" कहलाते हैं
  • सेवा "ओसरा" प्रणाली अनुसार बारी-बारी से
  • वंशज आज भी मंदिर के प्रमुख सेवायत

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